Govardhan Puja 2025: तिथि, समय, कथा और घर पर पूजा कैसे करें

गोवर्धन पूजा दिवाली के बाद आती है, जो सांसारिक उत्सव से ईश्वरीय कृतज्ञता की ओर संक्रमण का प्रतीक है। जहाँ दिवाली समृद्धि और प्रकाश का उत्सव मनाती है

नई दिल्ली: दिवाली की चमक के बाद, कृतज्ञता और धर्म का उत्सव मनाने का दिन आता है, Govardhan Puja या अन्नकूट। यह दिन अहंकार पर भक्ति और विनय की विजय का प्रतीक है और प्रकृति, जीविका और ईश्वरीय आश्रय के बीच के संबंध की याद दिलाता है।

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दिवाली के ठीक एक दिन बाद पड़ने वाला गोवर्धन पूजा पौराणिक कथाओं और जागरूकता से ओतप्रोत एक ऐसा त्योहार है। यह भगवान कृष्ण को धन्यवाद देने का दिन है जिन्होंने मानवता को अंधविश्वास के बजाय आत्मनिर्भरता और समुदाय का पाठ पढ़ाया।

Govardhan Puja 2025 कब है? तिथि और विवरण

2025 में गोवर्धन पूजा हिंदू कैलेंडर के अनुसार, कार्तिक माह की शुक्ल पक्ष प्रतिपदा, बुधवार, 22 अक्टूबर 2025 को पड़ेगी। विवरण इस प्रकार है:

(यह समय दिवाली अमावस्या के अगले दिन से मेल खाता है, जो 21 अक्टूबर की रात को समाप्त होगी।)

Govardhan Puja का समय और पूजा मुहूर्त

गोवर्धन पूजा का मुहूर्त प्रातः काल (सुबह), सूर्योदय के बाद और दोपहर से पहले पड़ता है। द्रिक पंचांग के अनुसार विवरण इस प्रकार है:

अमावस्या तिथि के दौरान यह अनुष्ठान न करने की सलाह दी जाती है, इसलिए प्रतिपदा तिथि शुरू होने के बाद पूजा करनी चाहिए।

गोवर्धन पूजा क्यों मनाई जाती है: त्योहार के पीछे की कहानी

Govardhan Puja का इतिहास भगवान कृष्ण और गोवर्धन पर्वत की घटना से जुड़ा है। हिंदू मान्यताओं के अनुसार, जब गोकुलवासियों ने बारिश के लिए भगवान इंद्र को प्रसन्न करने हेतु एक बड़ा दान दिया, तो युवा कृष्ण ने उन्हें रोक दिया। उन्होंने उनसे अनुरोध किया कि वे गोवर्धन पर्वत की पूजा करें, जो उनके भोजन, आश्रय और जल के वास्तविक दाता हैं।

क्रोधित होकर, इंद्र ने गाँव पर मूसलाधार बारिश कर दी। कृष्ण ने सात दिनों तक लोगों और गायों की रक्षा के लिए गोवर्धन पर्वत को अपनी छोटी उंगली पर उठाया। अपनी मूर्खता पर शर्मिंदा होकर, इंद्र ने अपनी गलती स्वीकार की और तूफान को रोक दिया।

इसके बाद, लोगों ने कृष्ण और पर्वत के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने के लिए भोजन का एक पहाड़ (अन्नकूट) पकाकर उत्सव मनाया, यह परंपरा आज भी जारी है।

घर पर Govardhan Puja कैसे करें: चरण-दर-चरण अनुष्ठान

दिवाली के बाद गोवर्धन पूजा का आध्यात्मिक महत्व

Govardhan Puja दिवाली के बाद आती है, जो सांसारिक उत्सव से ईश्वरीय कृतज्ञता की ओर संक्रमण का प्रतीक है। जहाँ दिवाली समृद्धि और प्रकाश का उत्सव मनाती है, वहीं गोवर्धन पूजा भक्तों को प्रकृति के उपहार के प्रति विनम्र और कृतज्ञ रहने की याद दिलाती है।

अधिकांश मंदिरों में, विशेष रूप से मथुरा और वृंदावन में, अन्नकूट महोत्सव भव्य रूप से मनाया जाता है, जिसमें भगवान कृष्ण को सैकड़ों व्यंजन अर्पित किए जाते हैं। यह स्थिरता के महत्व और मानव, पृथ्वी और ईश्वर की सुरक्षा के बीच आध्यात्मिक बंधन का भी संदेश देता है। गोवर्धन पूजा केवल एक त्योहार नहीं है; यह संतुलन, आराधना और विनम्रता का पाठ है।

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