Dr. Jitendra Singh ने मदन लाल ढींगरा की बहादुरी को याद किया, कांग्रेस की निंदा पर खेद जताया
डॉ. जितेंद्र सिंह ने यह भी कहा कि दुर्भाग्यवश, उस समय कांग्रेस पार्टी ने ढींगरा की कार्रवाई की निंदा करते हुए एक प्रस्ताव पारित किया और स्वयं महात्मा गांधी ने भी इस कृत्य से असहमति जताई।

केंद्रीय मंत्री Dr. Jitendra Singh ने एक कार्यक्रम में लेखक प्रकाश जी के कार्यों की सराहना करते हुए मदन लाल ढींगरा के जीवन से जुड़ी एक महत्वपूर्ण ऐतिहासिक घटना को उजागर किया। उन्होंने बताया कि 1 जुलाई 1909 को लंदन में भारतीय क्रांतिकारी मदन लाल ढींगरा ने ब्रिटिश अधिकारी कर्जन वायली की गोली मारकर हत्या कर दी थी।
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उन्होंने इस कार्रवाई के बाद आत्मसमर्पण कर दिया और मुकदमे के दौरान वकील रखने से साफ इनकार किया। उन्हें मौत की सज़ा सुनाई गई।
अपने अंतिम वक्तव्य में ढींगरा ने ब्रिटिश न्याय प्रणाली को चुनौती देते हुए लिखा: “किसी भी अंग्रेजी अदालत को मुझे गिरफ्तार करने का अधिकार नहीं है… यदि एक अंग्रेज के लिए जर्मनों से लड़ना देशभक्ति है, तो मेरे लिए अंग्रेजों के खिलाफ लड़ना उससे कहीं अधिक न्यायसंगत और देशभक्तिपूर्ण है।”
उनके इस वक्तव्य में उस ब्रिटिश कानून की दोहरी नीति पर सीधा प्रहार था, जिसमें उपनिवेशों में किए गए संघर्षों को अपराध घोषित किया जाता था, जबकि यूरोपीय संघर्षों को राष्ट्रभक्ति का रूप दिया जाता था।
Dr. Jitendra Singh का दावा – गांधी जी ने नहीं किया था ढींगरा का समर्थन

Dr. Jitendra Singh ने यह भी कहा कि दुर्भाग्यवश, उस समय कांग्रेस पार्टी ने ढींगरा की कार्रवाई की निंदा करते हुए एक प्रस्ताव पारित किया और स्वयं महात्मा गांधी ने भी इस कृत्य से असहमति जताई।
उनके परिवार का कोई सदस्य फांसी तक उनसे मिलने नहीं गया, न ही उनका शव लिया गया। ऐसे कठिन समय में केवल एक व्यक्ति था जिसने उनसे मिलने का साहस दिखाया — और वह थे वीर सावरकर, जो न केवल उनसे जेल में मिले, बल्कि उनके विचारों के पक्षधर भी रहे।
यह घटना भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के उस क्रांतिकारी अध्याय की याद दिलाती है जिसे अक्सर औपचारिक राष्ट्रीय विमर्श में स्थान नहीं मिलता, परंतु जिसने बलिदान, साहस और वैचारिक दृढ़ता का उच्चतम उदाहरण प्रस्तुत किया।
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