Neha Bora ने 10 हजार रुपये के पीस बॉन्ड नोटिस पर High Court से राहत मांगी

ऑल इंडिया स्टूडेंट्स एसोसिएशन (AISA) की अध्यक्ष Neha Bora ने दिल्ली हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाया है। उन्होंने एक स्पेशल एग्जीक्यूटिव मजिस्ट्रेट द्वारा जारी उस नोटिस को चुनौती दी है, जिसमें उनसे यह बताने को कहा गया है कि शांति बनाए रखने के लिए उन्हें 10,000 रुपये का पर्सनल बॉन्ड और एक ज़मानत (surety) क्यों नहीं देनी चाहिए।

अपनी याचिका में, Neha Bora ने भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS), 2023 की धारा 126 और 130 के तहत 17 अक्टूबर को जारी किए गए नोटिस और उससे जुड़ी सभी कार्यवाही को रद्द करने की मांग की है।

उन्होंने अधिकारियों को यह निर्देश देने की भी मांग की है कि वे इस नोटिस के आधार पर उनके खिलाफ कोई कठोर कार्रवाई न करें। याचिका के अनुसार, बोरा को 19 अक्टूबर को स्पेशल एग्जीक्यूटिव मजिस्ट्रेट के सामने पेश होने और यह बताने के लिए कहा गया था कि उन्हें BNSS की धारा 135(3) के तहत बॉन्ड क्यों नहीं देना चाहिए।

Neha Bora ने नोटिस पर सवाल उठाए

नोटिस को चुनौती देते हुए, Neha Bora ने आरोप लगाया है कि इसमें शांति भंग होने की आशंका को साबित करने के लिए कोई ठोस आधार नहीं बताया गया है। साथ ही, इसमें यह भी स्पष्ट नहीं किया गया है कि शांति भंग होने की आशंका किस समय, किस मौके या किस घटना के संदर्भ में जताई जा रही है।

याचिका के मुताबिक, नोटिस में 16 अक्टूबर को मंडी हाउस में नारे लगाने, BNSS की धारा 163 के तहत निषेधाज्ञा (prohibitory orders) लागू होने के बावजूद जंतर-मंतर के आसपास बार-बार विरोध प्रदर्शन करने, और उसी दिन कनॉट प्लेस में एक प्रदर्शन में शामिल होने के लिए लोगों को उकसाने का आरोप लगाया गया है।

Neha Bora ने कनॉट प्लेस में हुए प्रदर्शन से जुड़े आरोप को चुनौती दी है। उनका कहना है कि उन्होंने 16 अक्टूबर को शाम 5 बजे मंडी हाउस में एक शांतिपूर्ण सभा के लिए लोगों को बुलाया था।

उन्होंने बताया है कि उन्हें मंडी हाउस से हिरासत में लिया गया था, और उन्होंने जिस सभा के लिए लोगों को बुलाया था, वह नोटिस में बताए गए प्रदर्शन से अलग थी। याचिका में यह भी कहा गया है कि अधिकारियों ने वह मूल आदेश और सामग्री उपलब्ध नहीं कराई है, जिसके आधार पर यह कार्रवाई शुरू की गई है।

इस वजह से, वह इन आरोपों का सही तरीके से जवाब नहीं दे पा रही हैं। इसमें BNSS की धारा 163 के तहत जारी निषेधाज्ञा (prohibitory orders) पर निर्भर रहने के तरीके पर भी सवाल उठाया गया है।

तर्क यह है कि नोटिस में उस विशेष आदेश या घटना का जिक्र नहीं है, जिसका कथित तौर पर उल्लंघन किया गया हो। याचिका में कहा गया है कि संसद मार्ग उप-मंडल (sub-division) के सहायक पुलिस आयुक्त द्वारा 23 अगस्त को जारी आदेश में मंडी हाउस शामिल नहीं था और जंतर-मंतर रोड को इससे छूट दी गई थी।

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उप-मंडल में निषेधाज्ञा लागू

23 अगस्त के इस आदेश के तहत, कुछ विशेष छूटों को छोड़कर, पूरे उप-मंडल में 60 दिनों तक (21 अक्टूबर तक) सभाओं, नारों, भाषणों और पांच या उससे अधिक लोगों के इकट्ठा होने पर रोक लगा दी गई थी।

Neha Bora ने तर्क दिया है कि केवल शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शन में भाग लेने या इसके लिए आह्वान करने के आधार पर ही ‘निवारक कार्रवाई’ (preventive proceedings) शुरू नहीं की जा सकती। अधिकारियों को यह साबित करना होगा कि शांति भंग होने की प्रबल संभावना है।

याचिका में आरोप लगाया गया है कि यह नोटिस अस्पष्ट है, गलत तथ्यों पर आधारित है और निवारक शक्तियों का मनमाना इस्तेमाल है। याचिका में संविधान के अनुच्छेद 19 और 21 के तहत मिलने वाले मौलिक अधिकारों—जैसे अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, शांतिपूर्ण तरीके से इकट्ठा होने का अधिकार और व्यक्तिगत स्वतंत्रता—का भी हवाला दिया गया है।

याचिका के अनुसार, 16 अक्टूबर को शाम करीब 5:30 बजे मंडी हाउस से बोरा को हिरासत में ले लिया गया। उन्हें पहले किसी अज्ञात जगह पर और बाद में आर.के. पुरम पुलिस स्टेशन ले जाया गया, जहां उन्हें रात भर रखा गया।

17 अक्टूबर की सुबह करीब 6 बजे उन्हें रिहा किया गया। हिरासत में लिए जाने के बाद, विशेष कार्यकारी मजिस्ट्रेट (Special Executive Magistrate) ने एक नोटिस जारी कर उन्हें 19 अक्टूबर को पेश होने का निर्देश दिया।

Neha Bora का कहना है कि अगर उन्हें कोई राहत नहीं मिलती है, तो उनसे बॉन्ड भरने के लिए कहा जा सकता है, और ऐसा न करने पर उन्हें फिर से हिरासत में लिया जा सकता है।

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SIR विरोध में तिरंगा मार्च

यह याचिका 16 अक्टूबर को प्रस्तावित “लहरा दो तिरंगा” मार्च और प्रदर्शनों की पृष्ठभूमि में दायर की गई है, जो चुनाव आयोग की ‘विशेष गहन पुनरीक्षण’ (SIR) प्रक्रिया से जुड़े हैं।

प्रदर्शनकारियों ने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार से जवाबदेही की भी मांग की थी। प्रस्तावित मार्च से पहले ‘कॉकरोच जनता पार्टी’ (CJP) के अभिजीत दिपके को भी हिरासत में लिया गया था।

पुलिस की कार्रवाई के बारे में मिली शुरुआती जानकारी के अनुसार, उनके खिलाफ BNSS की धारा 126 और 170 के तहत कार्यवाही शुरू की गई थी। बाद में, उन्हें एक विशेष कार्यकारी मजिस्ट्रेट के सामने पेश किया गया और एक ‘शांति बांड’ (पीस बॉन्ड) भरवाने के बाद रिहा कर दिया गया।

मौजूदा याचिका में 17 अक्टूबर के नोटिस को रद्द करने और इस कार्यवाही के तहत की जाने वाली किसी भी कठोर कार्रवाई से सुरक्षा की मांग की गई है। यह मामला 16 अक्टूबर की घटनाओं के बाद बोरा के खिलाफ शुरू की गई एहतियाती कार्रवाई की वैधता से जुड़ा है।

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