NIPGR ने विकसित किया Gene-edited japonica rice, फॉस्फेट अवशोषण में वृद्धि और 20% अधिक उपज का दावा

“यह अनुसंधान दिखाता है कि सटीक जीन-संपादन कैसे कृषि उत्पादन को बढ़ा सकता है और साथ ही सुरक्षा भी सुनिश्चित करता है।” — डॉ. जितेन्द्र गिरी, NIPGR

नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ प्लांट जीनोम रिसर्च (NIPGR), नई दिल्ली के वैज्ञानिकों ने CRISPR-Cas9 जीन संपादन तकनीक का उपयोग करके एक विशेष प्रकार का japonica rice विकसित किया है। यह चावल बेहतर फॉस्फेट अवशोषण, अधिक सहनशीलता, और 20% अधिक पैदावार दिखाता है। यह भारत में स्थायी कृषि और फसल विविधता की दिशा में एक बड़ा कदम माना जा रहा है।

Agriculture में नए प्रयोग और तकनीकें

NIPGR की प्रमुख उपलब्धियाँ

NIPGR developed gene-edited japonica rice

CRISPR तकनीक द्वारा OsPHO1;2 जीन को संशोधित किया गया जिससे जड़ों से फॉस्फेट का बेहतर अवशोषण और पत्तियों तक उसका बेहतर स्थानांतरण हुआ। 20% अधिक उपज तब मिली जब सामान्य मात्रा में उर्वरक डाला गया। केवल 10% उर्वरक की मात्रा पर भी, पारंपरिक किस्मों की तुलना में 40% अधिक उपज मिली।

बीज की गुणवत्ता – जैसे आकार, प्रोटीन, स्टार्च, फॉस्फेट में कोई कमी नहीं आई।

नई रणनीति: वैज्ञानिकों ने रिप्रेसर जीन को हटाने की बजाय सिर्फ उसके बाइंडिंग साइट को हटाया, जिससे अन्य आवश्यक कार्य बाधित नहीं हुए।

वैज्ञानिक महत्व

भारत की अधिकांश मिट्टी में फॉस्फेट की कमी है, जिससे फसल उत्पादन प्रभावित होता है। यह जीन-संपादित चावल फॉस्फेट को जल्दी और अधिक कुशलता से अवशोषित करता है।

इससे कृषि में:

  • कम उर्वरक की आवश्यकता
  • बेहतर जल उपयोग दक्षता
  • नमक और सूखा सहनशीलता
  • बीमारियों से रक्षा (जैसे ब्लास्ट रोग) में मदद मिल सकती है।

भारत के लिए प्रभाव

भारत हर साल लगभग 4.5 मिलियन टन DAP (फॉस्फेट उर्वरक) आयात करता है।

यह चावल आयात पर निर्भरता कम, कृषि लागत घटाने और स्थायी खेती को बढ़ावा देने में सहायक हो सकता है।

अनुसंधान जापोनिका किस्म पर किया गया, लेकिन अब इसे भारतीय इण्डिका चावल में भी दोहराया जाएगा, जो देश में अधिक प्रचलित है।

विशेषज्ञों की राय

NIPGR developed gene-edited japonica rice

“यह अनुसंधान दिखाता है कि सटीक जीन-संपादन कैसे कृषि उत्पादन को बढ़ा सकता है और साथ ही सुरक्षा भी सुनिश्चित करता है।” — डॉ. जितेन्द्र गिरी, NIPGR

“यह कार्य भारतीय फॉस्फेट-ग़रीब मिट्टियों के लिए अत्यंत उपयोगी साबित होगा।” — डॉ. पी.वी. शिवप्रसाद, NCBS

तकनीकी बिंदु

कोई बाहरी डीएनए नहीं रह गया है; केवल वही पौधे बीज उत्पादन के लिए उपयोग किए गए जिनमें ऑफ-टारगेट प्रभाव नहीं पाए गए।

वैज्ञानिकों ने Southern Blot और इन सिलिको टूल्स का प्रयोग कर संपादन की सटीकता की पुष्टि की।

व्यापक प्रभाव

NIPGR developed gene-edited japonica rice

यह तकनीक खाद लागत कम करने के साथ-साथ कैडमियम जैसे भारी धातुओं की मिट्टी में मात्रा को भी कम कर सकती है।

चावल की भंडारण क्षमता, खाद्य सुरक्षा, और जलवायु अनुकूलता को बढ़ावा देती है।

भविष्य में इस तकनीक का उपयोग बायोफोर्टिफिकेशन, पाकगुणवत्ता और अन्य कृषि विशेषताओं को बेहतर बनाने में किया जा सकता है।

NIPGR का यह अनुसंधान भारत में कृषि जैव प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में एक क्रांतिकारी उपलब्धि है। यह चावल भारत की खाद्य सुरक्षा, किसान आय वृद्धि और उर्वरक-स्वावलंबन की दिशा में एक ठोस कदम है।

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