28 जून 2025 को Acharya Vidyanand जी महाराज के शताब्दी समारोह के अवसर पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा कि यह दिन केवल उनकी 100वीं जयंती का उत्सव नहीं है, बल्कि भारतीय आध्यात्मिक परंपरा और जैन संस्कृति की एक महान धरोहर का स्मरण भी है।
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प्रधानमंत्री ने विशेष रूप से इस तथ्य को रेखांकित किया कि 28 जून 1987 को आचार्य विद्यानंद मुनिराज को ‘आचार्य’ की उपाधि प्रदान की गई थी। उन्होंने कहा कि यह उपाधि केवल एक सम्मान का प्रतीक नहीं थी, बल्कि यह जैन संस्कृति को विचार, संयम और करुणा की पवित्र धारा से जोड़ने वाला एक ऐतिहासिक क्षण था।
आज जब हम Acharya Vidyanand जी की शताब्दी मना रहे हैं, तो यह हमें उस प्रेरणादायक क्षण की याद दिलाता है, जब उनके नेतृत्व ने समाज को नैतिक मूल्यों, अहिंसा और आध्यात्मिक जागरूकता की दिशा में अग्रसर किया। प्रधानमंत्री ने आचार्य जी के जीवन, उनके योगदान और उनके आदर्शों को नमन करते हुए युवाओं से उनके सिद्धांतों से प्रेरणा लेने का आह्वान किया।
Acharya Vidyanand Ji Maharaj के बारे में
Acharya Vidyanand जी महाराज जैन धर्म के एक महान आचार्य, तपस्वी, दार्शनिक और समाज-सुधारक थे, जिन्होंने अपने जीवन को अहिंसा, संयम, करुणा और सत्य के प्रचार-प्रसार में समर्पित किया। वे दिगंबर जैन संप्रदाय के विख्यात संतों में गिने जाते हैं और उनके आध्यात्मिक, बौद्धिक और सामाजिक योगदान को व्यापक रूप से सम्मान प्राप्त है।
आचार्य विद्यानंद जी महाराज के जीवन की प्रमुख विशेषताएँ:
जन्म और प्रारंभिक जीवन: आचार्य विद्यानंद जी का जन्म 1925 में हुआ था। बाल्यकाल से ही वे अध्ययनशील, गंभीर और वैराग्य भावना से ओत-प्रोत थे।
संन्यास और आध्यात्मिक जीवन: उन्होंने युवावस्था में ही सांसारिक जीवन त्यागकर संयम और तपस्या का मार्ग चुना। कठोर तप, गहन अध्ययन और आत्म साधना उनकी जीवन यात्रा का अभिन्न हिस्सा रहा।
अहिंसा और करुणा का संदेश: Acharya Vidyanand ने अहिंसा को जीवन का मूल आधार माना और अपने उपदेशों में हमेशा करुणा, जीवदया और सत्यनिष्ठा पर बल दिया। वे जैन दर्शन के माध्यम से विश्व शांति और नैतिक मूल्यों की स्थापना के पक्षधर थे।
सामाजिक योगदान: आचार्य विद्यानंद जी ने समाज में नैतिकता, शुद्धाचार और सामाजिक समरसता का प्रचार किया। उन्होंने शिक्षा, पर्यावरण संरक्षण और नशा मुक्ति जैसे अभियानों का समर्थन किया।
विद्वत्ता और भाषाविद्: आचार्य जी बहुभाषी थे और संस्कृत, प्राकृत, हिंदी समेत कई भाषाओं में गहन अध्ययन किया। उनके ग्रंथ और प्रवचन जैन दर्शन, तत्त्वज्ञान और नैतिक जीवन पर अमूल्य धरोहर माने जाते हैं।
सम्मान और स्मरण: 28 जून 1987 को उन्हें ‘आचार्य’ की उपाधि प्रदान की गई थी। उनके शताब्दी वर्ष (2025) में देशभर में अनेक श्रद्धांजलि और स्मृति कार्यक्रम आयोजित किए जा रहे हैं। प्रधानमंत्री मोदी सहित अनेक नेताओं ने उनके योगदान का स्मरण करते हुए उन्हें नमन किया है।
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