Newsnowसेहतशोधकर्ताओं का कहना है कि खराब डाइट से बच्चों कद रह सकता...

शोधकर्ताओं का कहना है कि खराब डाइट से बच्चों कद रह सकता है कम।

इम्पीरियल कॉलेज, लंदन की तरफ से किए गए शोध में बच्चों की खराब डाइट और कम औसत ऊंचाई और वजन में वृद्धि के बीच सीधा संबंध का पता चला है.

शोधकर्ताओं ने करीब 65 मिलियन बच्चों के डेटा का इस्तेमाल किया. कुल 193 देशों के बच्चों की उम्र 5 साल से 19 साल के बीच थी. डेटा के परीक्षण के बाद उन्होंने सबसे छोटे और सबसे लंबे देशों के बीच 20 सेंटीमीटर का फर्क पाया और लड़कों के लिए छह साल और लड़कियों के लिए आठ साल का विकास अंतराल उजागर हुआ. उदाहरण के तौर पर, 19 वर्षीय बांग्लादेशी लड़की की औसत ऊंचाई नीदरलैंड के 11 वर्षीय लड़के की ऊंचाई के बराबर थी.

शोध के दौरान बच्चे के स्वास्थ्य स्थिति का पता चलाने के लिए बॉडी मास इंडेक्स पर भी विचार किया गया. 1985-2019 के बीच संग्रहित डेटा का परीक्षण बताया कि 2019 में सबसे लंबे 19 वर्ष की उम्र के बच्चों का संबंध उत्तर-पश्चिम और मध्य यूरोप समेत नीदरलैंड, डेनमार्क से रहा जबकि दक्षिण और दक्षिण पूर्व एशिया, लैटिन अमेरिका और पूर्वी अफ्रीका समेत ग्वाटेमाला और बांग्लादेश के 19 वर्षीय बच्चे 2019 में सबसे छोटे पाए गए. इस बीच, चीन, दक्षिण कोरिया और कुछ दक्षिण-पूर्व एशिया में 35 वर्ष की अवधि के दौरान देशों की औसत ऊंचाई में सुधार देखा गया.

यह भी पढ़ें : मीठे ड्रिंक्स पीने से रहें दूर हो सकता है हार्ट अटैक का खतरा

कद में कमी, वजन में वृद्धि के बीच सीधा संबंध

शोध से खुलासा हुआ कि विश्व स्वास्थ्य संगठन के तय मानकों के मुताबिक स्वस्थ घोषित किए गए पांच साल की उम्र के बच्चों में अगले साल बड़े पैमाने पर कमी आई. शोध के आधार पर शोधकर्ता बच्चे के भोजन में पोषण, विटामिन और मिनरल का वर्तमान इनपुट, महत्व और भूमिका पर विचार करने लगे हैं. माना जाता है कि देशों को बच्चों की खातिर पौष्टिक फूड की कीमत घटाने पर प्रेरित किया जा सकता है. शोधकर्ताओं की सलाह है कि देशों को ऐसी नीति अपनानी चाहिए जिससे कद के लिए वजन बढ़ाए बिना ज्यादा लंबा होने में मदद मिले.

उन्होंने कहा कि कुछ देशों में पांच साल की उम्र तक के बच्चों का स्वस्थ तरीके से विकास हुआ मगर स्कूल जाने के वर्षों में गिरावट देखी गई. इससे पता चला कि प्री-स्कूल जानेवाले बच्चे, स्कूल जानेवाले बच्चे और किशोरों के पोषण में सुधार के बीच अंतर है. शोध के वरिष्ठ लेखकर प्रोफेसर माजिद एजाती कहते हैं, “ये मुद्दा खास तौर से कोविड-19 महामारी के दौरान सामने आया जब स्कूल दुनिया भर में बंद हैं और बहुत सारे गरीब परिवार बच्चों को पर्याप्त पौष्टिक खाना दे नहीं पा रहे हैं.”