भारत की सांस्कृतिक विविधता में लोक-नृत्य एक महत्वपूर्ण स्थान रखते हैं। केरल का Pulikkali, जिसे टाइगर डांस कहा जाता है, इसी परंपरा का एक जीवंत उदाहरण है। यह नृत्य विशेष रूप से ओणम पर्व के दौरान किया जाता है और अपनी अनोखी शैली तथा आकर्षक रंग-रूप के कारण राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर प्रसिद्ध है।
‘एक Dance Show को सफल बनाने के लिए आकर्षक उपस्थिति महत्वपूर्ण है’ – एक विश्लेषण
Pulikkali का इतिहास लगभग 200 वर्ष पुराना है। इसकी शुरुआत त्रिशूर (Thrissur) में कोच्चि के महाराजा राम वर्मा सक्थान थम्पुरन ने की थी। उद्देश्य था ओणम पर्व को और अधिक आनंदमय तथा लोक-उन्मुख बनाना।
Pulikkali नृत्य शैली और प्रदर्शन
कलाकार अपने पूरे शरीर को बाघ, शेर या शॉट्री की तरह रंगते हैं।
पेट और चेहरे पर बाघ जैसी संरचनाएं बनाई गई हैं।
डांसर चेंडा, फूकु और थाकिल जैसे पारंपरिक वाद्ययंत्रों की थाप पर झूमते हैं।
यह बाघ और शिकारी के खेल को प्रतीकात्मक रूप में प्रस्तुत करता है।
सांस्कृतिक महत्व
पुलिक्कली केवल नृत्य नहीं बल्कि शास्त्रीय उत्सव भी है।
यह शक्ति और शौर्य का प्रतीक माना जाता है।
त्रिशूर जिले में आज भी इसकी सबसे बड़ी शिकारी घटना होती है, जिसमें हजारों दर्शक शामिल होते हैं।
पर्यटन और सांस्कृतिक पहचान दोनों के दृष्टिकोण से पुलिक्कली का विशेष महत्व है।
आधुनिक परिदृश्य
आज पुलिक्कली समितियाँ (क्लब) इसे संयुक्त रूप में प्रस्तुत करती हैं। इसमें कलाकारों की संख्या बढ़ी है और इसकी झलक विश्वभर में सामने आई है। यह नृत्य न केवल केरल की संस्कृति का प्रतिनिधि बन गया है बल्कि भारत की लोक-परंपराओं की विविधता का भी स्रोत है।
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