Election Commission पर भरोसे का संकट: लोकतंत्र के सामने गंभीर खतरा
भारत का लोकतंत्र हमेशा से चुनौतियों से जूझता रहा है, लेकिन चुनाव आयोग की निष्पक्षता ही उसकी असली गारंटी रही है। यदि आयोग ही पक्षपात और अपारदर्शिता से ग्रस्त दिखे, तो लोकतांत्रिक व्यवस्था का भविष्य गहरे संकट में है।

भारत के मुख्य Election Commission ज्ञानेश कुमार की हालिया प्रेस कॉन्फ्रेंस ने देश में बहस छेड़ दी है। विपक्ष की “वोट चोरी” संबंधी शिकायतों को नज़रअंदाज़ करने और अहंकारी लहजे में जवाब देने से चुनाव आयोग की साख पर गंभीर सवाल उठे हैं।
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Election Commission का संवैधानिक महत्व
- संविधान के अनुच्छेद 324 के तहत चुनाव आयोग स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनावों का प्रहरी है।
- पिछले सात दशकों में आयोग ने भारत को दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र बनाने में अहम भूमिका निभाई है।
- टी.एन. शेषन जैसे मुख्य चुनाव आयुक्तों ने साबित किया कि आयोग नेताओं से ऊपर संविधान को रखता है।
ऐतिहासिक पृष्ठभूमि: लोकतंत्र की चुनौतियाँ

- आपातकाल (1975-77) में इंदिरा गांधी ने लोकतांत्रिक संस्थाओं को कुचला – प्रेस पर सेंसरशिप, विपक्ष की गिरफ्तारी, न्यायपालिका की विफलता।
- लोकतंत्र को अंततः चुनावों ने ही बचाया।
- 1977 के चुनावों में इंदिरा गांधी की हार ने साबित किया कि स्वतंत्र चुनाव ही जनता की सबसे बड़ी ताकत हैं।
वर्तमान संकट
- विपक्ष आरोप लगा रहा है कि आयोग मतदाता सूचियों में गड़बड़ी और फर्जी वोट जोड़ने में लिप्त है।
- इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन (EVM) पर कभी बड़े पैमाने पर भरोसा था, लेकिन अब उस पर भी सवाल उठने लगे हैं।
- चुनाव आयोग की चुप्पी और आक्रामक रुख ने लोगों का भरोसा तोड़ा है।
लोकतंत्र पर असर

- मताधिकार नागरिक की सबसे बड़ी ताकत है।
- यदि जनता को लगे कि उसका वोट मायने नहीं रखता, तो लोकतंत्र की आत्मा ही खत्म हो जाती है।
- आयोग का गिरता भरोसा भारत को लोकतंत्र के सबसे गंभीर संकटों की ओर ले जा रहा है।
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