गुरुवार को BJP सांसद Raghav Chadha ने कुछ डॉक्टरों और डायग्नोस्टिक सेंटरों के बीच कथित “रेफरल कमीशन” और “कट मनी” के लेन-देन का मुद्दा उठाया।
उन्होंने आरोप लगाया कि यह चलन एक “पैरेलल इंसेंटिव इकोनॉमी” (समानांतर प्रोत्साहन अर्थव्यवस्था) बन गया है, जिससे मरीज़ों के मेडिकल बिल बढ़ जाते हैं और गैर-ज़रूरी डायग्नोस्टिक टेस्ट को बढ़ावा मिलता है।
राज्यसभा में चर्चा के दौरान चड्ढा ने आरोप लगाया कि यह चलन, भले ही “अनौपचारिक” हो, हेल्थकेयर सेक्टर के कुछ हिस्सों में एक पक्की व्यवस्था बन गया है।
उन्होंने कहा, “मैं कुछ डॉक्टरों और कुछ डायग्नोस्टिक सेंटरों के बीच चल रहे ‘रेफरल इंसेंटिव’ और ‘कट मनी अरेंजमेंट’ की बात कर रहा हूं, जो अब एक अनौपचारिक व्यवस्था बन गई है।
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Raghav Chadha का आरोप- ‘कट मनी’ के कारण कराए जा रहे अनावश्यक मेडिकल टेस्ट
आपका इलाज करने के लिए नहीं, बल्कि सिर्फ़ आपको रेफर करने के लिए डॉक्टर की जेब में 3,000 रुपये डाले जाते हैं। इसके लिए कमीशन की एक तय दर है, खास एजेंट हैं; यह एक पैरेलल इंसेंटिव इकोनॉमी है।”
बीजेपी नेता ने आरोप लगाया कि डॉक्टर और डायग्नोस्टिक सेंटर अपने रिकॉर्ड में इन पेमेंट को अलग तरह से दिखाते हैं, जबकि इसका आर्थिक बोझ आखिरकार मरीज़ों को उठाना पड़ता है।
उन्होंने कहा, “आसान भाषा में कहें तो डॉक्टरों के लिए इसे ‘रेफरल कमीशन’ कहा जाता है और डायग्नोस्टिक सेंटर के हिसाब-किताब में इसे ‘मार्केटिंग खर्च’ के तौर पर दर्ज किया जाता है।
यह कमीशन आमतौर पर प्रोसीजर की लागत के प्रतिशत के रूप में लिया जाता है और कुछ मामलों में, डायग्नोस्टिक सेंटर डॉक्टरों को विदेश यात्रा पर भी भेजते हैं।”
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Raghav Chadha ने MCI नियमों का हवाला देकर ‘फी स्प्लिटिंग’ पर उठाए सवाल
Raghav Chadha ने बताया कि मेडिकल काउंसिल ऑफ़ इंडिया के कोड ऑफ़ एथिक्स के नियम 6.4 ने 2002 में ही इस प्रैक्टिस को “फी स्प्लिटिंग” (फीस का बंटवारा) मानकर प्रतिबंधित कर दिया था।
उन्होंने आगे कहा कि नेशनल मेडिकल कमीशन के रजिस्टर्ड मेडिकल प्रैक्टिशनर रेगुलेशंस, 2023 में भी इसे “खास तौर पर रेफरल कमीशन के तौर पर प्रतिबंधित” किया गया है, और उल्लंघन करने वालों के लिए एक से तीन महीने तक के सस्पेंशन का प्रावधान भी किया गया है।
उन्होंने कहा, “गंभीर उल्लंघन के मामलों में धोखाधड़ी, साज़िश और कंज्यूमर प्रोटेक्शन एक्ट (उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम) की धाराएं भी लगाई जा सकती हैं।”
Raghav Chadha ने इस बात पर ज़ोर दिया कि इस व्यवस्था का खर्च आखिरकार मरीज़ों पर ही पड़ता है।उन्होंने कहा, “इस खर्च का बोझ – यानी ‘कट मनी’ का बोझ – डायग्नोस्टिक सेंटर नहीं उठाता; यह मरीज़ के इनवॉइस या बिल में पहले से ही शामिल कर दिया जाता है।
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‘कट मनी’ से बढ़ रहा मरीजों का मेडिकल बिल, अनावश्यक टेस्ट पर सवाल
‘इंडियन जर्नल ऑफ़ मेडिकल एथिक्स’ के अनुसार, इससे कभी-कभी मरीज़ का मेडिकल या इलाज का बिल 15 से 20 प्रतिशत तक बढ़ सकता है।”उन्होंने तर्क दिया कि बढ़ा-चढ़ाकर बिल बनाना ही एकमात्र समस्या नहीं है।
उन्होंने सदन को बताया, “असली समस्या यह है कि इससे अनावश्यक मेडिकल टेस्ट और ज़रूरत से ज़्यादा रेफरल का चलन बढ़ता है।”अपने बयान को स्पष्ट करते हुए Raghav Chadha ने कहा कि उनकी आलोचना कथित रेफरल कमीशन प्रणाली पर थी, न कि चिकित्सा पेशे पर।
उन्होंने कहा, “यह मांग डॉक्टरों के खिलाफ नहीं है; यह केवल ‘कट मनी’ रेफरल प्रणाली के खिलाफ है। हम अपने देश के डॉक्टरों को भगवान का दूसरा रूप मानते हैं।” उन्होंने आगे कहा कि अधिकांश डॉक्टर पूरी ईमानदारी, समर्पण और निष्ठा के साथ मरीजों की सेवा करते हैं, लेकिन कुछ डॉक्टर इस रेफरल प्रणाली में फंस गए हैं।
सांसद ने मरीजों को कुछ चेतावनी संकेत भी बताए जिन पर ध्यान देना चाहिए। उन्होंने कहा कि किसी डॉक्टर द्वारा किसी विशेष निदान केंद्र पर जाने का दबाव, किसी मान्यता प्राप्त वैकल्पिक प्रयोगशाला को चुनने पर दिखाई देने वाली झुंझलाहट, या मार्केटिंग अधिकारियों या प्रचार सामग्री की उपस्थिति, ये सभी चेतावनी संकेत हो सकते हैं।
सांसद ने मरीज़ों को कुछ ऐसे चेतावनी भरे संकेतों के बारे में भी बताया जिन पर उन्हें ध्यान देना चाहिए। उन्होंने कहा कि अगर डॉक्टर किसी खास डायग्नोस्टिक सेंटर पर जाने का दबाव डाले,
या मरीज़ के किसी दूसरी मान्यता प्राप्त लैब को चुनने पर डॉक्टर को साफ़ तौर पर झुंझलाहट हो,या डॉक्टर के क्लिनिक में किसी डायग्नोस्टिक सेंटर के मार्केटिंग एग्जीक्यूटिव या प्रचार का सामान मौजूद हो, तो इन सभी बातों को “खतरे के संकेत” (red flags) के तौर पर देखा जाना चाहिए।
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मरीजों को खास डायग्नोस्टिक सेंटर रेफरल पर सतर्क रहने की सलाह
उन्होंने कहा, “मैं यह कहना चाहूंगा कि मरीज़ों को खास तौर पर ‘रेड फ़्लैग्स’ (चेतावनी के संकेतों) पर ध्यान देना चाहिए। अगर कोई डॉक्टर आपको किसी खास डायग्नोस्टिक सेंटर पर जाने के लिए दबाव डाले, तो इस बात पर ध्यान दें।
अगर वे इसलिए चिढ़ जाएं या नाराज़ हों कि आपने किसी दूसरी मान्यता प्राप्त सुविधा या पैथोलॉजी लैब में टेस्ट करवाया है, तो इसे एक चेतावनी का संकेत मानें। अगर आपको डॉक्टर के क्लिनिक में किसी डायग्नोस्टिक सेंटर के मार्केटिंग एग्जीक्यूटिव या प्रचार सामग्री दिखे, तो उस पर भी ध्यान दें।”
Raghav Chadha ने आरोप लगाया कि यह चलन खास तौर पर टियर-2 और टियर-3 शहरों में ज़्यादा है, जहां उनके मुताबिक, कुछ डॉक्टरों औरडायग्नोस्टिक सेंटरों के बीच रेफरल कमीशन का लेन-देन एक “अनौपचारिक अर्थव्यवस्था” (informal economy) बन गया है।
उन्होंने अपील की कि हेल्थकेयर सिस्टम में ज़्यादा पारदर्शिता लाने और मरीज़ों को बेवजह के आर्थिक और मेडिकल बोझ से बचाने के लिए ऐसी गतिविधियों पर रोक लगाई जानी चाहिए।
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