कांग्रेस महासचिव Jairam Ramesh ने मंगलवार को भारतीय जनता पार्टी (BJP) शासित मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ सरकारों पर गंभीर आरोप लगाते हुए कहा कि दोनों राज्यों ने आदिवासी कल्याण और वन अधिकारों से जुड़े कानूनों के क्रियान्वयन में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) की भूमिका को “इंस्टीट्यूशनलाइज़” करने की दिशा में कदम बढ़ाया है। उन्होंने दावा किया कि इन राज्यों में बनाई गई विशेष टास्क फोर्स लोकतांत्रिक संस्थाओं की भूमिका को कमजोर कर रही हैं और जल्द ही ओडिशा भी इसी राह पर चल सकता है।
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Jairam Ramesh ने PESA और वन अधिकार कानूनों को लेकर उठाए सवाल
सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर एक पोस्ट में Jairam Ramesh ने कहा कि मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ सरकारों ने पंचायत (अनुसूचित क्षेत्रों में विस्तार) अधिनियम, 1996 (PESA) और वन अधिकार अधिनियम, 2006 (FRA) को लागू करने के लिए विशेष टास्क फोर्स गठित की हैं। उनके अनुसार, इन टास्क फोर्स के जरिए RSS से जुड़े संगठनों की भूमिका को औपचारिक रूप से स्थापित किया जा रहा है।
रमेश ने लिखा, “मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ सरकारों ने PESA और FRA को लागू करने में RSS की भूमिका को संस्थागत रूप देने के लिए टास्क फोर्स बनाई हैं। ओडिशा जल्द ही ऐसा करने वाला तीसरा राज्य बन सकता है।”
ग्राम सभाओं की शक्तियां कमजोर करने का आरोप
कांग्रेस नेता Jairam Ramesh ने आरोप लगाया कि RSS से संबद्ध अखिल भारतीय वनवासी कल्याण आश्रम इन कानूनों के तहत बनाए गए लोकतांत्रिक ढांचे को प्रभावित करने का प्रयास कर रहा है। उन्होंने कहा कि विशेष रूप से ग्राम सभाओं की भूमिका और अधिकारों को सीमित करने की कोशिश की जा रही है, जबकि इन कानूनों का मूल उद्देश्य स्थानीय समुदायों को अधिक अधिकार देना था।
Jairam Ramesh ने कहा, “ये टास्क फोर्स संसद द्वारा पारित इन दोनों कानूनों के बुनियादी लोकतांत्रिक ढांचे को नुकसान पहुंचा रही हैं। RSS से जुड़ा अखिल भारतीय वनवासी कल्याण आश्रम ग्राम सभाओं की भूमिका से जुड़े कानूनी नियमों को हाईजैक करने की कोशिश कर रहा है।”
Jairam Ramesh ने कहा कि PESA और FRA दोनों ही लंबे जन आंदोलनों का परिणाम हैं और इनका उद्देश्य आदिवासी समुदायों को अपनी भूमि, जंगल और प्राकृतिक संसाधनों पर अधिकार देना था। ऐसे में इन कानूनों के क्रियान्वयन में बाहरी हस्तक्षेप उनके मूल उद्देश्य को कमजोर कर सकता है।
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कॉर्पोरेट हितों को फायदा पहुंचाने का आरोप
जयराम रमेश ने इस मुद्दे को कॉर्पोरेट हितों से भी जोड़ते हुए दावा किया कि इन बदलावों का लाभ खनन कंपनियों को मिल सकता है। उन्होंने आरोप लगाया कि जंगलों और आदिवासी क्षेत्रों में प्राकृतिक संसाधनों के दोहन को आसान बनाने के लिए लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं को कमजोर किया जा रहा है।
उन्होंने कहा, “यह कोई संयोग नहीं है कि इन टास्क फोर्स का एक प्रभाव जंगल क्षेत्रों में खनन गतिविधियों को आसान बनाना भी हो सकता है। इससे बड़ी खनन कंपनियों को लाभ मिलेगा, जिनमें सबसे चर्चित ‘मोदानी साम्राज्य’ भी शामिल है।”
हालांकि, कांग्रेस नेता ने अपने आरोपों के समर्थन में कोई अतिरिक्त दस्तावेज या साक्ष्य सार्वजनिक नहीं किए।
आदिवासी अधिकारों को लेकर बढ़ी राजनीतिक बहस
PESA अधिनियम 1996 और वन अधिकार अधिनियम 2006 को आदिवासी समुदायों के अधिकारों की सुरक्षा के लिए महत्वपूर्ण कानून माना जाता है। इन कानूनों के तहत ग्राम सभाओं को स्थानीय संसाधनों के प्रबंधन, भूमि उपयोग और विकास योजनाओं पर महत्वपूर्ण निर्णय लेने का अधिकार दिया गया है।
जयराम रमेश के आरोपों के बाद आदिवासी अधिकारों, स्थानीय स्वशासन और प्राकृतिक संसाधनों के प्रबंधन को लेकर राजनीतिक बहस तेज हो गई है। कांग्रेस का आरोप है कि भाजपा शासित राज्यों में इन कानूनों की मूल भावना को कमजोर किया जा रहा है, जबकि भाजपा और संबंधित राज्य सरकारों की ओर से अभी तक इन आरोपों पर कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है।
आने वाले दिनों में यह मुद्दा आदिवासी क्षेत्रों की राजनीति और संसाधन प्रबंधन से जुड़ी राष्ट्रीय बहस का महत्वपूर्ण हिस्सा बन सकता है।
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