अरावली पर बड़ा विवाद: Jairam Ramesh बोले- इकोसिस्टम पर खतरा अभी टला नहीं

कांग्रेस नेता और पूर्व केंद्रीय पर्यावरण मंत्री Jairam Ramesh ने अरावली पर्वतमाला को नए सिरे से परिभाषित करने के मुद्दे पर चिंता जताते हुए कहा है कि अरावली इकोसिस्टम पर खतरा अभी पूरी तरह से टला नहीं है। Jairam Ramesh ने सुप्रीम कोर्ट द्वारा गठित पांच सदस्यीय हाई-पावर्ड कमेटी की संरचना पर सवाल उठाते हुए कहा कि इस मामले में जनता, मीडिया और सिविल सोसाइटी के दबाव को बनाए रखने और और अधिक मजबूत करने की आवश्यकता है।

Jairam Ramesh हाई-पावर्ड कमेटी की संरचना पर उठाए सवाल

सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘एक्स’ पर किए गए एक पोस्ट में Jairam Ramesh ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट द्वारा गठित पांच सदस्यीय समिति में अधिकांश सदस्य वर्तमान या सेवानिवृत्त सरकारी अधिकारी हैं, जिससे समिति की स्वतंत्रता और निष्पक्षता को लेकर सवाल उठते हैं।

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Jairam Ramesh ने कहा कि समिति की अध्यक्षता केंद्रीय पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय के एक कार्यरत अधिकारी द्वारा की जा रही है, जबकि सदस्य सचिव का पद भी मंत्रालय के एक अन्य कार्यरत अधिकारी के पास है। उनके अनुसार, यह व्यवस्था समिति की स्वायत्तता को लेकर चिंताएं पैदा करती है।

‘री-डेफिनिशन का कोई उचित आधार नहीं’

Jairam Ramesh ने दावा किया कि अरावली पर्वतमाला को नए सिरे से परिभाषित करने का कोई ठोस या वैज्ञानिक आधार नहीं है। उन्होंने कहा कि फॉरेस्ट सर्वे ऑफ इंडिया ने भी सितंबर 2025 में इस प्रस्ताव को खारिज कर दिया था।

उन्होंने कहा कि अरावली जैसे संवेदनशील पारिस्थितिक तंत्र के साथ किसी भी प्रकार का प्रयोग पर्यावरणीय दृष्टि से गंभीर परिणाम पैदा कर सकता है।

सुप्रीम कोर्ट के फैसले का किया जिक्र

कांग्रेस नेता ने कहा कि 29 दिसंबर, 2025 को सुप्रीम कोर्ट ने अपने 20 नवंबर, 2025 के पूर्व आदेश पर रोक लगाकर विवेकपूर्ण और साहसिक कदम उठाया था। उनके अनुसार, यदि पहले के आदेश को लागू किया जाता, तो इसके गंभीर पर्यावरणीय परिणाम हो सकते थे।

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उन्होंने कहा कि अब सुप्रीम कोर्ट ने इस पूरे मामले की विस्तृत समीक्षा के लिए एक हाई-पावर्ड कमेटी गठित की है, जिससे इस विषय पर नए सिरे से विचार किया जाएगा।

जनदबाव बनाए रखने की अपील

Jairam Ramesh ने कहा कि नवंबर 2025 में जब सुप्रीम कोर्ट का पहला आदेश आया था, तब जनता, मीडिया और नागरिक समाज के व्यापक दबाव ने इस मुद्दे को राष्ट्रीय स्तर पर प्रमुखता से उठाया था।

उन्होंने कहा कि अरावली पारिस्थितिकी तंत्र की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए उसी तरह का सार्वजनिक दबाव आगे भी बनाए रखना आवश्यक है। उन्होंने उम्मीद जताई कि गठित समिति अरावली की पुनर्परिभाषा के पक्ष में कोई सिफारिश नहीं करेगी।

क्या है अरावली विवाद?

सुप्रीम कोर्ट ने अरावली पर्वतमाला की परिभाषा से जुड़े विवाद पर स्वतः संज्ञान लेते हुए केंद्र सरकार और अरावली क्षेत्र से जुड़े चार राज्यों—राजस्थान, हरियाणा, गुजरात और दिल्ली—को नोटिस जारी किया था।

यह विवाद केंद्र सरकार द्वारा प्रस्तावित उस परिभाषा को लेकर उठा था, जिसमें अरावली क्षेत्र की पहचान के लिए 100 मीटर की ऊंचाई को एक प्रमुख मानदंड के रूप में शामिल किया गया था। इस प्रस्ताव को लेकर पर्यावरणविदों और कई सामाजिक संगठनों ने चिंता व्यक्त की थी।

दिसंबर 2025 में केंद्रीय पर्यावरण मंत्रालय ने संबंधित राज्यों को निर्देश दिया था कि अरावली क्षेत्र में नई खनन लीज जारी करने पर रोक लगाई जाए, ताकि इस संवेदनशील पर्वतीय क्षेत्र की पारिस्थितिक एकता को सुरक्षित रखा जा सके।

भारत की सबसे प्राचीन पर्वतमालाओं में से एक है अरावली

अरावली पर्वतमाला उत्तर-पश्चिम भारत में लगभग 670 किलोमीटर तक फैली हुई है। यह दिल्ली के निकट से शुरू होकर हरियाणा और राजस्थान से गुजरते हुए गुजरात तक पहुंचती है। राजस्थान के माउंट आबू स्थित गुरु शिखर, जिसकी ऊंचाई लगभग 1,722 मीटर है, अरावली की सबसे ऊंची चोटी मानी जाती है।

विशेषज्ञों के अनुसार, अरावली पर्वतमाला विश्व की सबसे प्राचीन फोल्ड माउंटेन श्रृंखलाओं में से एक है और इसकी आयु लगभग दो अरब वर्ष आंकी जाती है। यह पर्वतमाला उत्तर भारत के पर्यावरणीय संतुलन, भूजल संरक्षण और जैव विविधता के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण मानी जाती है।

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