भारत में 25 जून 1975 को लगाए गए आपातकाल (इमरजेंसी) के 50 वर्ष पूरे होने पर राजनीतिक बयानबाज़ी तेज हो गई है। भारतीय जनता पार्टी (BJP) ने Congress पर लोकतांत्रिक संस्थाओं को कमजोर करने का आरोप लगाया है, जबकि Congress लगातार सरकार पर लोकतांत्रिक मूल्यों को लेकर सवाल उठाती रही है। इसी बीच बीजेपी सांसद रविशंकर प्रसाद और दिल्ली की मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता ने इमरजेंसी को भारतीय लोकतंत्र का सबसे काला अध्याय बताया।
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रविशंकर प्रसाद ने Congress पर बोला हमला
दिल्ली में मीडिया से बातचीत करते हुए बीजेपी सांसद रविशंकर प्रसाद ने कहा कि वर्ष 1975 में लगाई गई इमरजेंसी का उद्देश्य देशहित नहीं, बल्कि तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की कुर्सी बचाना था। उन्होंने कहा कि इलाहाबाद हाई कोर्ट द्वारा इंदिरा गांधी का चुनाव रद्द किए जाने के बाद राजनीतिक संकट पैदा हुआ और उसी संकट से निकलने के लिए आपातकाल लगाया गया।
प्रसाद ने कहा कि वह स्वयं जेपी आंदोलन का हिस्सा रहे हैं और इमरजेंसी के दौरान लोकतंत्र की बहाली के लिए संघर्ष किया था। उनके अनुसार, उस दौर में लोकतांत्रिक अधिकारों का व्यापक दमन किया गया।
इंदिरा गांधी के चुनाव से जुड़ा विवाद
रविशंकर प्रसाद ने कहा कि 12 जून 1975 को इलाहाबाद हाई कोर्ट ने इंदिरा गांधी के 1971 के लोकसभा चुनाव को अमान्य घोषित कर दिया था। बाद में मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा, जहां उन्हें सीमित राहत मिली। सुप्रीम कोर्ट ने उन्हें प्रधानमंत्री बने रहने की अनुमति तो दी, लेकिन संसद में मतदान करने के अधिकार पर रोक लगा दी थी।
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बीजेपी सांसद का दावा है कि इसी राजनीतिक संकट के बाद आपातकाल लागू करने का फैसला लिया गया।
रेखा गुप्ता ने Emergency को बताया लोकतंत्र का काला अध्याय
दिल्ली की मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता ने भी 25 जून 1975 को भारतीय लोकतंत्र के इतिहास का “सबसे काला अध्याय” बताया। उन्होंने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘एक्स’ पर लिखा कि आपातकाल के दौरान नागरिक अधिकारों को कुचला गया, प्रेस की स्वतंत्रता पर प्रतिबंध लगाए गए और अभिव्यक्ति की आजादी को दबाया गया।
उन्होंने आरोप लगाया कि तत्कालीन कांग्रेस सरकार का यह फैसला सत्ता के अहंकार और तानाशाही सोच का प्रतीक था। मुख्यमंत्री ने कहा कि लोकतंत्र की रक्षा के लिए संघर्ष करने वाले अनेक लोगों को उस समय जेल और यातनाओं का सामना करना पड़ा।
क्या था इमरजेंसी का इतिहास?
25 जून 1975 को तत्कालीन राष्ट्रपति फखरुद्दीन अली अहमद ने संविधान के अनुच्छेद 352 के तहत आंतरिक अशांति का हवाला देते हुए देश में राष्ट्रीय आपातकाल की घोषणा की थी। यह आपातकाल 21 मार्च 1977 तक प्रभावी रहा।
उस समय बिहार और गुजरात में जयप्रकाश नारायण के नेतृत्व में बड़े जन आंदोलन चल रहे थे। बढ़ती महंगाई, बेरोजगारी, भ्रष्टाचार और राजनीतिक अस्थिरता के कारण सरकार पर दबाव बढ़ रहा था। इसी बीच इलाहाबाद हाई कोर्ट के फैसले ने राजनीतिक स्थिति को और गंभीर बना दिया।
इमरजेंसी के दौरान क्या हुआ?
इमरजेंसी के दौरान देशभर में विपक्षी नेताओं की गिरफ्तारियां हुईं, प्रेस सेंसरशिप लागू की गई और नागरिक स्वतंत्रताओं पर कई प्रतिबंध लगाए गए। इसी अवधि में बड़े पैमाने पर नसबंदी अभियान और शहरी “सुंदरीकरण” कार्यक्रम भी विवादों का विषय बने।
आपातकाल समाप्त होने के बाद इसकी जांच के लिए आयोग गठित किए गए और भविष्य में आपातकालीन शक्तियों के दुरुपयोग को रोकने के उद्देश्य से कानूनी एवं संवैधानिक बदलाव किए गए।
‘संविधान हत्या दिवस’ के रूप में मनाया गया दिन
केंद्र सरकार ने 25 जून को “संविधान हत्या दिवस” के रूप में मनाने का निर्णय लिया है। सरकार का कहना है कि इस दिन का उद्देश्य आपातकाल के दौरान लोकतांत्रिक संस्थाओं पर पड़े प्रभाव को याद करना और संविधान तथा लोकतांत्रिक मूल्यों के प्रति देश की प्रतिबद्धता को मजबूत करना है।
हालांकि, इस मुद्दे पर राजनीतिक दलों के बीच मतभेद बने हुए हैं। जहां बीजेपी इसे लोकतंत्र पर हमला बताती है, वहीं Congress इस मुद्दे पर सरकार की मंशा और राजनीतिक संदेश पर सवाल उठाती रही है।
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