पश्चिम बंगाल की राजनीति में कथित सिग्नेचर जालसाजी मामले को लेकर हलचल लगातार बढ़ती जा रही है। इसी कड़ी में तृणमूल कांग्रेस (TMC) विधायक और पार्टी के वरिष्ठ नेता कुणाल घोष रविवार को क्रिमिनल इन्वेस्टिगेशन डिपार्टमेंट (CID) के मुख्यालय भवानी भवन पहुंचे, जहां उनसे मामले को लेकर पूछताछ की जानी थी। जांच एजेंसी इस मामले में विधानसभा से जुड़े कुछ दस्तावेजों पर कथित फर्जी हस्ताक्षरों के आरोपों की जांच कर रही है।
CID के समक्ष पेश होने से पहले कुणाल घोष ने मीडिया से बातचीत में कहा कि उन्हें गवाह के तौर पर बुलाया गया है और वह जांच में पूरा सहयोग करेंगे। उन्होंने कहा, “मुझे दोपहर 3:30 बजे रिपोर्ट करने के लिए कहा गया है। मैं पहले भी इस मामले में जांच एजेंसी के सामने पेश हो चुका हूं। यदि उनके पास और सवाल हैं, तो मैं उनका जवाब दूंगा। मैं हमेशा जांच में सहयोग करता आया हूं और आगे भी करता रहूंगा।”
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क्या है पूरा मामला?
यह विवाद पश्चिम बंगाल विधानसभा में विपक्ष के नेता (LoP) और अन्य पदाधिकारियों की नियुक्ति से जुड़े एक प्रस्ताव को लेकर सामने आया है। आरोप है कि विधानसभा स्पीकर को सौंपे गए कुछ दस्तावेजों में हस्ताक्षरों को लेकर अनियमितताएं हुईं और कुछ दस्तावेज कथित रूप से बाद में तैयार किए गए।
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मामले के केंद्र में वह प्रस्ताव है जिसमें सोभनदेब चट्टोपाध्याय को विधानसभा में नेता विपक्ष, असीमा पात्रा और नयना बंद्योपाध्याय को उपनेता विपक्ष तथा फिरहाद हकीम को मुख्य सचेतक (चीफ व्हिप) नियुक्त किए जाने का उल्लेख किया गया था।
TMC के राष्ट्रीय महासचिव अभिषेक बनर्जी ने 9 मई को विधानसभा स्पीकर को सूचित किया था कि पार्टी की विधायी बैठक में इन नियुक्तियों को मंजूरी दी गई थी। इसके बाद 18 मई को विधानसभा के प्रधान सचिव ने अभिषेक बनर्जी को पत्र भेजकर बैठक के मिनट्स, प्रस्ताव और उपस्थित विधायकों के हस्ताक्षर उपलब्ध कराने को कहा था।
शिकायत के बाद शुरू हुई जांच
20 मई को अभिषेक बनर्जी ने बैठक की कार्यवाही और उपस्थिति रजिस्टर की प्रतियां जमा कीं, जिनमें दावा किया गया था कि 6 मई को हुई बैठक में 70 विधायक मौजूद थे। हालांकि, 27 मई को TMC के दो विधायकों ने स्पीकर के समक्ष शिकायत दर्ज कराई कि 6 मई की बैठक में ऐसा कोई प्रस्ताव पारित नहीं हुआ था।
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शिकायतकर्ताओं ने आरोप लगाया कि उन्होंने केवल 19 मई को दस्तावेजों पर हस्ताक्षर किए थे और 6 मई की बैठक से जुड़े प्रस्ताव को बाद में तैयार किया गया। उन्होंने यह भी दावा किया कि दस्तावेजों में दर्ज कुछ हस्ताक्षर संदिग्ध हैं और उनमें हेरफेर की आशंका है।
CID की जांच और बयान दर्ज
जांच के दौरान CID ने उन 13 विधायकों के बयान दर्ज किए हैं जिनके हस्ताक्षर बड़े अक्षरों में दर्ज पाए गए थे। एजेंसी यह पता लगाने की कोशिश कर रही है कि दस्तावेजों में किसी प्रकार की जालसाजी या प्रक्रिया संबंधी अनियमितता हुई थी या नहीं।
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इसी मामले में 13 जून को अभिषेक बनर्जी से भी लगभग साढ़े पांच घंटे तक पूछताछ की गई थी। उनसे विधानसभा में जमा किए गए दस्तावेजों और हस्ताक्षरों से जुड़े विभिन्न पहलुओं पर सवाल पूछे गए थे।
TMC पार्टी के भीतर भी बढ़ा विवाद
मामले ने TMC के अंदर भी विवाद पैदा कर दिया है। शिकायत दर्ज कराने वाले दो विधायकों—संदीपन साहा और रीताब्रत बनर्जी—को पार्टी ने बाद में “पार्टी विरोधी गतिविधियों” के आरोप में निलंबित कर दिया।
इस घटनाक्रम ने पश्चिम बंगाल की राजनीति में नई बहस छेड़ दी है। एक तरफ जांच एजेंसियां दस्तावेजों की सत्यता की पड़ताल कर रही हैं, वहीं दूसरी ओर विपक्ष इस मामले को लेकर सरकार और तृणमूल नेतृत्व पर सवाल उठा रहा है।
फिलहाल CID की जांच जारी है और आने वाले दिनों में इस मामले में और भी नेताओं तथा विधायकों से पूछताछ की संभावना जताई जा रही है। पूरे घटनाक्रम पर राज्य की राजनीतिक नजरें टिकी हुई हैं।
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