भगवान Mahavira जैन धर्म के 24वें तीर्थंकर थे। उनका जन्म वैशाली में हुआ था और उन्होंने अपने जीवनकाल में अहिंसा, सत्य, अपरिग्रह जैसे उच्च आदर्शों का प्रचार किया।
निर्वाण कल्याणक दिवस उस दिन को कहते हैं जब भगवान महावीर ने मोक्ष प्राप्त किया था। यह जैन धर्म का सबसे महत्वपूर्ण त्योहारों में से एक है। इस दिन जैन धर्म के अनुयायी भगवान महावीर को श्रद्धांजलि अर्पित करते हैं और उनके उपदेशों का पालन करने का संकल्प लेते हैं।
भगवान Mahavira का 2551वां Nirvan Kalyanak Day का महत्व
- अहिंसा का संदेश: यह दिन हमें अहिंसा के महत्व को याद दिलाता है। भगवान महावीर ने सारे जीवों के प्रति करुणा और दया का संदेश दिया था।
- आत्मशुद्धि: इस दिन जैन धर्म के अनुयायी आत्मशुद्धि के लिए उपवास करते हैं और धार्मिक अनुष्ठान करते हैं।
- सामाजिक समरसता: यह त्योहार सामाजिक समरसता और एकता का प्रतीक है।
- धार्मिक उत्सव: इस दिन जैन मंदिरों में विशेष पूजा-अर्चना की जाती है और भंडारे का आयोजन किया जाता है।
2551वां Nirvan Kalyanak Day कब मनाया जाता है?
Lord Mahavira का निर्वाण कल्याणक दिवस हर साल एक ही तारीख को मनाया जाता है। यह दिन आमतौर पर अक्टूबर या नवंबर के महीने में आता है।
Note: यदि आप 2551वें निर्वाण कल्याणक दिवस की सटीक तारीख जानना चाहते हैं, तो आप किसी जैन मंदिर या जैन धर्म से जुड़े किसी व्यक्ति से संपर्क कर सकते हैं।
Mahavira के प्रति मेरी भावनाएँ
दीपों के पर्व पर चेतन, निज घर में कर तू आत्मरमण
प्रभु महावीर की तरह स्वयं को स्वयं आत्मसात कर
कर्मों को क्षय करने की जागृति चिंतन में लानी हैं ………..
आत्मा का “प्रदीप “ पाने को भव सागर से पार होना है…..
कोई तेरे को हँसाता, कोई तेरे को दुःखी करता
यह संसार हैं सुख-दुःख का मैलारे!
चेतन तू निज स्वभाव में रहकर, ले जीने का प्रण (1)
सुख -दुख, प्रेम-शोक, जन्म-मरण कर्मों की लीला
भव-भ्रमण से साथ में रहने वाले कर्मों की विचित्र लीला
रे चेतन ! सम्भाव में रहकर, सम्यक् चिंतन का ले प्रण (2)
समय का क्या भरोसा, साँसो का पँछी पल में उड़ जाता
आउखे की घड़ी आते ही कोई भी नहीं रुकता
रे चेतन ! राग – द्वेष को जितना ही हैं, इसका लें तू प्रण (3)
पर भावो में दुःख होता, निज स्वभाव में सुख होता
आत्मा का कल्याण स्वयं से स्वयं का होता
रे चेतन ! तुझे इसको विकसाना हैं, ऐसा तुझे लेना हैं प्रण(4)
आत्मा अजर अमर अविनाशी, शुद्ध रूप ये दिव्य प्रकाश
जन्म-मरण की श्रृंखला का तोड़ना हैं घेरा
रे चेतन ! निज आत्मा में सूख मिलता हैं, ये हो हमारा प्रण(5)