Karnataka विधान परिषद में विपक्ष के नेता और भारतीय जनता पार्टी (भा.ज.पा.) के सदस्य, चलवाडी नारायणस्वामी ने राज्य सरकार पर आरोप लगाया है कि उसने पिछड़ा वर्ग आयोग के जाति आधारित सर्वेक्षण में विभिन्न जातियों को ईसाई धर्म से जोड़ दिया है। उन्होंने इसे संविधान विरोधी और सामाजिक न्याय के खिलाफ बताया है।
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Karnataka जाति जनगणना विवाद: नारायणस्वामी की आपत्ति के मुख्य बिंदु:
जातियों का धर्म से जोड़ना: नारायणस्वामी ने कहा कि सर्वेक्षण में वोक्कालिगा, लिंगायत और अन्य उच्च जातियों को ईसाई धर्म से जोड़ा गया है, जबकि ये जातियाँ पारंपरिक रूप से हिंदू धर्म से संबंधित हैं। उन्होंने इसे गलत और संविधान विरोधी बताया है।
एससी/एसटी आरक्षण पर प्रभाव: उनका कहना है कि यदि धर्म परिवर्तन के बाद जाति को उसी रूप में रखा गया तो अनुसूचित जाति (एससी) और अनुसूचित जनजाति (एसटी) के लाभार्थियों को आरक्षण के लाभ से वंचित किया जा सकता है। यह संविधान के अनुच्छेद 341 और 342 का उल्लंघन होगा।
Karnataka सरकार की मंशा पर सवाल: नारायणस्वामी ने मुख्यमंत्री सिद्धारमैया से पूछा कि इस कदम के पीछे क्या मंशा है। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि कांग्रेस सरकार जाति आधारित सर्वेक्षण के माध्यम से वोट बैंक की राजनीति कर रही है।
धर्म परिवर्तन के बाद जाति का दर्जा: उन्होंने यह भी कहा कि धर्म परिवर्तन के बाद व्यक्ति को उसी धर्म से संबंधित जाति का दर्जा दिया जाना चाहिए, न कि पुराने धर्म की जाति का। उदाहरण के लिए, लिंगायत को ईसाई धर्म में शामिल करना गलत है।
भाजपा की स्थिति:
भा.ज.पा. ने राज्य सरकार से मांग की है कि जाति आधारित सर्वेक्षण में धर्म परिवर्तन के बाद जाति को जोड़ने की प्रक्रिया को तुरंत रोका जाए। पार्टी का कहना है कि यह कदम सामाजिक सौहार्द को बिगाड़ सकता है और संविधान के खिलाफ है।
यह विवाद Karnataka में जाति आधारित आरक्षण और सामाजिक न्याय के मुद्दों पर गहरा प्रभाव डाल सकता है। राज्य सरकार को इस पर स्पष्टता प्रदान करनी होगी ताकि समाज में कोई भ्रम या असहमति न हो।
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