कोलकाता: पश्चिम बंगाल की राजनीति में तृणमूल कांग्रेस (TMC) के भीतर बढ़ते असंतोष और बगावत की खबरों ने सियासी माहौल को गर्म कर दिया है। भारतीय जनता पार्टी (BJP) के सांसद मनन कुमार मिश्रा ने मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के नेतृत्व पर तीखा हमला बोलते हुए दावा किया है कि TMC के कई नेता लंबे समय से दबाव और भय के माहौल में काम कर रहे थे। उन्होंने आरोप लगाया कि ममता बनर्जी के नेतृत्व में पार्टी के भीतर “आतंक का राज” था, जिसके कारण कई नेता खुद को असहज और दबाव में महसूस कर रहे थे।
मनन कुमार मिश्रा ने कहा कि वर्तमान स्थिति में TMC नेताओं के बीच किसी प्रकार का डर या घबराहट नहीं दिखाई दे रही है। उनके अनुसार, यह डर पहले ममता बनर्जी के नेतृत्व के दौरान महसूस किया जाता था। मिश्रा ने दावा किया कि राजनीतिक परिस्थितियों में बदलाव और प्रशासनिक माहौल बदलने के बाद कई नेताओं को खुलकर अपनी बात रखने का अवसर मिला है।
उन्होंने कहा कि यदि कुछ नेता नई पार्टी बनाने, किसी अन्य राजनीतिक दल का समर्थन करने या स्वतंत्र रूप से अपनी राजनीतिक दिशा तय करने की बात कर रहे हैं, तो यह इस बात का संकेत है कि वे पहले पार्टी के भीतर घुटन महसूस कर रहे थे। मिश्रा ने यह भी कहा कि इन नेताओं पर किसी बाहरी दबाव का आरोप लगाना गलत होगा और कानून अपने तरीके से काम करता रहेगा।
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TMC में बढ़ी संगठनात्मक दरार
इसी बीच, तृणमूल कांग्रेस की सांसद काकोली घोष दस्तीदार ने पुष्टि की है कि पार्टी के 20 सांसदों के एक समूह ने लोकसभा में अलग बैठने की व्यवस्था की मांग की है। इस घटनाक्रम को TMC के भीतर बढ़ती संगठनात्मक फूट और असंतोष के संकेत के रूप में देखा जा रहा है।
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सूत्रों के अनुसार, अलग पहचान की मांग करने वाले सांसदों में बापी हलधर, डॉ. शर्मिला सरकार, प्रसून बंद्योपाध्याय, जगदीश बर्मा बसुनिया, असित कुमार मल, अरूप चक्रवर्ती, रचना बनर्जी, सायोनी घोष, खलीलुर रहमान, अबू ताहिर खान, यूसुफ पठान, मिताली बाग, माला रॉय, कालीपद सोरेन, दीपक अधिकारी, जून मालिया और पार्थ भौमिक सहित कई प्रमुख नाम शामिल हैं।
हालांकि पार्टी नेतृत्व की ओर से इस मांग पर अभी तक कोई विस्तृत प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है, लेकिन राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह घटनाक्रम TMC के लिए चिंता का विषय बन सकता है।
चुनावी प्रदर्शन के बाद बढ़ा असंतोष
राजनीतिक पर्यवेक्षकों का मानना है कि पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में पार्टी के अपेक्षाकृत कमजोर प्रदर्शन के बाद संगठन के भीतर मतभेद अधिक खुलकर सामने आने लगे हैं। पार्टी के कुछ वरिष्ठ नेताओं और केंद्रीय नेतृत्व के बीच रणनीति, संगठनात्मक फैसलों और नेतृत्व शैली को लेकर असहमति की खबरें लगातार सामने आती रही हैं।
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इसी पृष्ठभूमि में अलग समूह बनाने और लोकसभा में अलग बैठने की मांग को महत्वपूर्ण राजनीतिक घटनाक्रम माना जा रहा है। इससे यह संकेत मिल रहा है कि पार्टी के भीतर कई सांसद अपनी स्वतंत्र राजनीतिक पहचान और भूमिका को लेकर नए विकल्प तलाश रहे हैं।
Bengal की राजनीति पर असर
बीजेपी इस पूरे घटनाक्रम को TMC की आंतरिक कमजोरी और नेतृत्व संकट के रूप में पेश कर रही है, जबकि तृणमूल कांग्रेस इसे पार्टी के अंदर की सामान्य लोकतांत्रिक प्रक्रिया बता सकती है। आने वाले दिनों में लोकसभा अध्यक्ष से संभावित मुलाकात, असंतुष्ट सांसदों की रणनीति और ममता बनर्जी की प्रतिक्रिया पर सभी की नजरें टिकी रहेंगी।
फिलहाल इतना तय माना जा रहा है कि TMC के भीतर बढ़ती असहमति और बागी सुर पश्चिम बंगाल की राजनीति को नए मोड़ पर ले जा सकते हैं। यदि असंतुष्ट सांसद अपने रुख पर कायम रहते हैं, तो इसका असर न केवल पार्टी संगठन बल्कि राज्य की व्यापक राजनीतिक तस्वीर पर भी पड़ सकता है।
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